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Saturday, September 10, 2016

मैं दर्द लिखता हूँ



बेशक मैं मेरे शब्दों से मेरा दर्द लिखता हूँ
जो हासिल न हुआ अब तलक वो हमदर्द लिखता हूँ
एक अधूरी कहानी जो बिखरी है लफ़्ज़ों के दरमियां
उन अधूरी कहानियों का मैं थोड़ा सा जर्द लिखता हूँ.


बिस्तर के सिरहाने पे कई ख्वाब रखे हैं
हर रात जो बिखर जाते हैं मेरी यादों की तरह
और चादर की सिलवटों में जो सिसकियाँ कैद हैं
मैं उन सिसकियों में पले मेरे सब दर्द लिखता हूँ.


काले अंधेरो में कई चेहरे अब ताना बुनते हैं
जो फिर बिखर जाते हैं जुगनू की रौशनी की तरह
एक सर्द रात में थामा था उसने जो हाँथ मेरा
अक्सर मैं उन सर्द रातों के मेरे सब दर्द लिखता हूँ.


                                                                              - Gaurav Kumar


Thursday, August 25, 2016

मुसाफिर (Musafir)



अब तक तो इन जख्मो को भर जाना था
जो वादे किये थे मैंने उनसे मुकर जाना था
एक रास्ता हैं जो जाता है तेरे घर की तरफ
उन रास्तो का मेरे दिल से उतर जाना था

भटका हुआ मुसाफिर जो दर बदर फिरता है
अब तक तो उसकी मंजिल को मिल जाना था
हांथो की लकीरो पे भरोसा करके बैठा रहा वो
अब तक तो उन लकीरो को उभर जाना था

हर रिश्ता उसने दूसरो से तोड़ रख्खा था
पुरानी यादों से खुद को जोड़ रख्खा था
हर शक्श सोचता रहा अब तलक कैसे ज़िंदा है
कि इस दौर में आते तक तो उसे बिखर जाना था

                                                                                                   गौरव यादव